

रमेश समर्थन
हम विद्यार्थिए रही त कुछ संघतियाके हाहूमे परल रही । हाहूके प्रभाव एहन परल कि हमरा सिगरेट पिएके चस्का लाग गेल रहे । अलमी त नभेली, लेकिन यदाकदा फुँकेके मन होइत रहे । एहन मन बढाबेवाला तत्व रहे जे सिगरेटके कस लेलापर देहमे एक प्रकारके जवानीवाला अनुभव होखे । उहो उमरके खेल रहे । नाकके निचे मोछके घेरा नलागल रहे पर मोछपर ताओ चढाबेके मन होखे ।
हम यदाकदा सिगरेट त पियइत रही पर नुकाके । माईबाबुके कहियो थाह नलागल कि हुनकर मझिला बेटा सेहो सिगरेट पियइत हए । हुन दुनू गोटेके अलम बन गेल रहे आ हमर सँझिला भाइ सेहो खुलके पियइत रहे ।
सन १९७७÷७८ सालमे हम उत्तर प्रदेशके ऋषिकेशमे रहके पढइत रही । ओई समयमे पाँच पैसामे एगो पनामा सिगरेट मिलइत रहे । हम संघतिया दस पैसाके दूगो सिगरेट किनइत रहली आ सलाहीके एक दू तिली कहींसे जुटावइत रहली आ छात्रावाससे बहुत दूर गंगाके कान्हीपर जाके पखलपर बैठल पैर पानीमे बोरले सिगरेटके कस लेइत रहली आ देहमे आबेवाला तनावमे आनन्दित होइत रहली । हँ, एगो काम हम कहियो नबिसरइत रहली । ऊ काम रहे, साथमे किताब लेनाइ । देखेबालाके लगइत रहे कि लइका पढासु हए । खूब पढले । लेकिन अप्पन खेल त दोसरे रहे । एतनो होइतो लग्नमे बृहस्पति रहलाके कारण कहियो फेल नभेली । फेल नभेली, एतने न, अप्पन कक्षामे सिकेन्ड नभेली ।

हँ, हम करइरत रही सिगरेटके बात । त, २०४२ सालके भादो १ गते हम गौर पहुँचल रही मटिहानी, जलेश्वर, भिट्ठामोड, सुरसन्ड, सीतामढी आ बैरगनिया होइत । शिक्षा अधिकारी सायद कौनो गोविन्द रहस आ माविनि रहस रामवृक्ष साह । शंकर खतिवडा (बढहरवा) आ विष्णुकान्त मिश्र (सेढवा) रहस प्राविनि । हमर अन्तर्वार्ता भेल आ हमरा संस्कृत मा.वि. मत्सरीके नाओमे लिखल सिफारिस पत्र देलगेल । २ गते सबेरे नौ बजे हम उहे पत्र लेले पैरे पैरे मत्सरी, कार्तिकेश झाके दुरापर पहुँचली । कार्तिकेशजी विद्यालयके प्रधानाध्यापक रहस ।
विधि आ प्रक्रिया सम्पन्न भेलापर हमरा माशिमे अस्थायी नियुक्ति देलगेल आ हम प्राशि रूपनारायण झा (दाहउर मास्टर साहब) के घरमे डेरा जमइली । ऊ एगो खलङा रहे । हम नीचे सुते लगली । उपर मास्टर साहेबके परिवार रहे । परिवारमे तीनगो सन्तान रहे – नीरा, सन्तोष, संजीव । संजीव अभी छोटे रहे आ नङटे डाँरामे लटकल घुँघरु बजवइत चले ।
एक दिन, साँझके पढाइ आ खनाइ पूरा भेल रहे । मास्टर साहेब नरहलन हँ । महतारी आ तीनो लइका ऊपर सुते गेल आ नीचे हम सुतेके उपक्रम कइली । अचानक हमरा सिगरेट पिएके मन भेल । हम दिया–सलाही जराके सिगरेट सुनगैली आ एक कस (दम) खिंचली । अन्हारमे सबतर इजोतसँगे सिगरेटके धुवाँ आ गन्ध पटाहाके छेदसे उपर चलगेल आ संजीवके पहिले थाहा लागल । ऊ, चिचियायल, गे, गे, गे माय ! देख न, मास्टर साहेब बिडी पियइता !
मास्टरनी ओकरा त चुप करयलन पर हमरा मनके ऊ छोट लइकाके बोली झकझोर देलक । हम ओही दिनसे सिगरेट पिनाइ सफा छोडिए देली । सिगरेट छोडली, ई एगो बात भेल । हम खैनी पानके अलमोसे दूर रहली । आजु हमरा संजीवके ऊ आवाज फेनो इयाद आयल त ओकरा संस्मरणके रूप देवेके मन भेल – गे माय ! मास्टर साहेब बिडी पियइता !

